तथागत बुद्ध के शिष्यों में आनन्द प्रमुख शिष्य थे। तथागत के सभी शिष्यों में आनन्द को ही भगवन्‌ का सामिप्य सबसे अधिक प्राप्त हुआ था। यह आनन्द के जीवन की बड़ी कृत-कृत्यता थी कि उन्हे भगवान के उपस्थाक (उपट्ठाक) का पद प्राप्त था। उपस्थाक का कार्य होता था तथागत की सेवा एवम् उनके दैनिक कार्यों की हर छोटी और बड़ी जरूरतों का ध्यान रखना।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ‘धम्मभंडागारिक’ आनन्द आपने नाम के अनुरूप सौम्यता की प्रतिमूर्ति एवम् स्वभाव से मृदु थे। सबसे अधिक बौद्ध वचनों को सुनने का सौभाग्य आनन्द को मिला था और उन्होंने अपनी स्मृति के तथागत की वाणी को ज्यों का त्यों संग्रहित कर लिया था इसलिए भिक्षु संघ उन्हें ‘धर्म का भंडारी’ अर्थात ‘धम्मभंडागारिक’ कहकर पुकारती थी।

बहुश्रुत आनन्द की स्मरण शक्ति ऐसी थी कि वें तथागत के मुख से निकले एक से लेकर साठ हजार शब्दो को ठीक से एक क्रम में, बिना एक अक्षर छोड़े स्मरण कर लेते थे। यही कारण था कि स्वयं भगवान दशबल (बुद्ध) ने आनन्द को अपने स्मृतिमान् और बहुश्रुत शिष्यों में प्रधान कहा था।

आनन्द तथागत के सगोत्रीय अर्थात शाक्यवंशीय थे। आनन्द और तथागत के पिता शुद्धोदन और अमृतौदन भाई-भाई थे, इस नाते बुद्ध और आनंद रिश्ते में चचेरे भाई थे। उम्र में भी आनन्द और सिद्धार्थ सामान ही थे। लेकिन संपूर्ण विश्व पर करुणा रखने वाले भगवान बुद्ध के लिए इन रिश्तों का क्या मूल्य ? अगर मूल्य रहता तो फिर बुद्धत्व कैसा ?

शाक्यवंश जातीय अभिमान में चूर रहने वाली जाति थी लेकिन शाक्यकुमार आनन्द की प्रव्रज्या के बाद यह अभिमान विलीन हो गया।

बुद्धत्व प्राप्त होने के दूसरे वर्ष में भगवान बुद्ध कपिलवस्तु के पास अनुपिया नामक कस्बे में उपदेश दे रहे थे। बुद्धउपदेशों की प्रतिध्वनि जब शाक्यकुमारों तक पहुंँची तो वे किसी प्रकार माता पिता से आज्ञा ले तथागत के दर्शन हेतु पधारे।

छ: शाक्यकुमारो भद्दीय, अनिरुद्ध, आनन्द, भृगु, किम्बिल और देवदत्त जब भगवान के पास पहुंँचे तो उनके साथ उनका एक नाई उपालि भी था जो स्वामिभक्ति के कारण कुमारों के साथ चला आया था।

शाक्यकुमारों ने जब बुद्ध-शासन में रहने का निर्णय किया तो उपालि नाई को अपने सब आभूषण और वस्त्र आदि देकर उसे लौटाने का प्रयास किया। किन्तु नाई ने कुमारों के आभूषणों को ले जाकर एक वृक्ष पर टांग दिए और ‘जो इस आभूषणों को देखे वह ले जाए’ का उद्घोष कर वापस बुद्ध के समीप आ गया।

बुद्ध-उपदेश सुनकर बौद्ध धम्म के शामिल होने जा रहे शाक्यकुमार आनन्द सबसे पहले जाति के बंधन को तोड़ते है और तथागत से प्रार्थना करते है कि वे सबसे पहले नाई उपालि को प्रव्रजित करे ताकि बाकी शाक्यराजकुमार नाई का अभिवादन कर सके, प्रत्युथान करे, इसके सम्मान में खड़े हो, हाथ जोड़े एवम् वंदन करे। हुआ भी ऐसा ही तथागत ने पहले उपालि को प्रव्रजित किया और बाद में शाक्य कुमार प्रव्रजित हुए। इस घटना के बाद क्षत्रिय समेत अनेकों जातियों ने सन्यास ग्रहण किया। स्थविर आनन्द के प्रयास ने सन्यास-ग्रहण में ब्राह्मणों के एकाधिकार को मिटाया।

वेदांत ऋषि साधना के क्षेत्र में स्त्रियों की समानता के बड़े पक्षपाती थे। किंतु सामाजिक आंदोलन के रूप में स्त्री के तेज को नवीन प्रकर्ष भगवान बुद्ध से मिला। यह भी संभव हुआ स्थविर आनन्द के कारण।

आनंद शिल्प का मस्तक, उत्तरी जियांगतांगशान गुफाएं, उत्तरी क्यूई राजवंश, सन 550-577

भगवन् महाविजयी (बुद्ध) की मौसी महाप्रजापति गोतमी ने तीन बार प्रव्रज्या ग्रहण करने की अनुमति मांँगी किंतु तीनो बार तथागत ने इंकार कर दिया। माता गोमती ने आनन्द से सहायता हेतु प्रार्थना की।

आनन्द के निवेदन पर शास्ता (बुद्ध) ने कहा, “आनन्द ! तुम्हे यह रुचिकर नहीं होना चाहिए कि तथागत के द्वारा साक्षात्कार किये हुए धर्म में स्त्रियाँ भी घर से बेघर हो प्रवज्या ग्रहण करें।” यह सुन आनन्द को चुप होना पड़ा किंतु कुछ दिनोपरांत आनन्द ने पुन: प्रयास करते हुए कहा, “सन्ते ! क्या प्रथागत- प्रवेदित-धर्म मे स्त्रियां स्त्रोत- आपत्तिफल, सकृदागामि-फल, अनागामि- फल और अहवफल को साक्षात्कार कर सकती है ?”

“साक्षात् कर सकती है आनन्द !” – बुद्ध बोले।

फिर क्या था, भगवान् को प्रजापती गौतमी की प्रव्रज्या के लिए आज्ञा देने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस प्रकार भिक्षुणी संघ की स्थापना आनन्द के प्रयत्न से ही हुई ।

आनन्द भगवान् दशबल (बुद्ध) के बड़े भक्त थे। भगवान को थोड़ा कष्ट होने पर वह विकल हो उठते थे। प्रतिदिन रात्रि में नौ बार एक हाथ में दीपक लेकर और दूसरे हाथ में डंडा लेकर आनन्द मूलगंध – कुटी का चक्कर लगाते ताकि तथागत की निद्रा कोई भंग न कर दे।

जब एक बार देवदत्त (भगवान् बुद्ध के विद्रोही शिष्य) के षड्यन्त्र से नीलगिरि नामक मस्त हाथी शराब पिलाकर भगवान् के ऊपर छोड़ा गया ताकि वह बुद्ध को हानि पहुंँचा सके। तो आनन्द हाथी को देखकर अपनी जान की परवाह न कर भगवान् बुद्ध के सामने खड़े हो गए।

भगवान् बुद्ध ने तीन बार मना किया कि ‘आगे से हट जाओ आनन्द’, परन्तु शास्ता के प्रति आनन्द का इतना अगाध प्रेम था कि वे न हटे। अपने प्रेम मे वे शास्ता की आज्ञा की भी परवाह नही करते थे।

अपने परिनिर्वाण समय में अपने समीप आनन्द को न देख तथागत ने भिक्षुओं से आनन्द को बुलाकर लाने का आदेश दिया। तथागत के शोक में व्याकुल आनन्द विहार में एक खूंँटी पकड़ रो रहे थे।

रोते हुए आनन्द को देखकर दशवल (बुद्ध) बोले, “आनन्द तुमने चिरकाल तक कायिक, मानसिक और वाचिक कर्म से मेरी सेवा की है। तुम अब निर्वाण साधना ने लगो, शीघ्र ही मुक्ति मिलेगी।” भगवान बुद्ध ने अपने अंतिम उपदेश में भिक्षुओं के समझ आनन्द के गुणों का वर्णन किया। आनन्द एवम् अन्य भिक्षुओं को अंतिम आवश्यक उपदेश देकर शास्ता ने निर्वाण प्राप्त किया।

तथागत की सेवा व उपदेशों का सबसे अधिक सामिप्य पाने एवम् तथागत के महापरिनिर्वाण काल तक चालीस वर्ष बौद्ध संघ में रहने के उपरांत भी आनन्द ‘अर्हत् अवस्था’ को प्राप्त नहीं कर सके और इसलिए वह परिनिर्वाण काल में शोक करते है। तथागत के परिनिर्वाण के उपरांत आनन्द कई वर्षो तक जीवित रहे और बौद्ध संघ का यह धम्मभंडागारिक अपने स्मृति के भंडारण से बौद्ध वचनों को समाज तक पहुंँचाता रहा।

By द्वारिका नाथ पांडेय

लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्नातक छात्र

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