शृंखला के प्रथम भाग में हमने विविध पुराणों में भैरव की कथा के विषय में चर्चा की।

भैरव शृंखला के द्वितीय भाग में विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार भैरव का वर्णन पढा।

विष्णुधर्मोत्तर के अनुसार भैरव का वर्ण मेघ के काले घने बादल के समान काला और उनके वस्त्र हाथी या व्याघ्र के चर्म से बने होने चाहिए।

बडा़ उदर, गोल पीले रंग की आंखें और नाक के चौड़े नथुने भैरव को भीषण रूप प्रदान करते हैं, और मानव खोपड़ियों की माला तथा सर्पों का शृंगार उन्हें और भी भयावह बनाने का कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त उनके शिल्प को त्रिशूल, खडग खट्वांग, खप्पर (कपाल), पाशुपतास्र और पाश जैसे आयुधों से सज्ज किया जाता है।

भैरव को महिलाओं के रक्षक देवता के रूप में भी जाना जाता है और इसी कारण उन्हें सर्पों से आभूषित किया जाता है। भारत के बहुत से गाँवों में ग्राम देवता के रूप में वैविध्यपूर्ण नामों से भैरव के ही विविध प्रकार के रूपों की पूजा की जाती है।

उत्तुंग हिमालय और नेपाल से द्रविड़ प्रदेश के महासागर तक भैरव को पूजा जाता है और जनमानस में उनकी यही छवि उन्हें लोकदेवता के आसन पर आरूढ़ करती है।

उज्जैन, काशी, प्रभास इत्यादि ज्योतिर्लिंगों के क्षेत्रपाल के रूप में भी भैरव सदियों से इन पवित्र तीर्थों में वास कर रहे हैं। शक्तिपीठों के आसपास भैरव की चौकियों का होना भी अनिवार्य माना गया है।

मंदिर स्थापत्य में भी भैरव का विशिष्ट स्थान निर्धारित है। शिव मंदिरों में स्थापत्य के उत्तरी भाग में पश्चिमाभिमुख प्रतिमा का विधान है। मंदिरों में चित्रित भैरव को चतुर्भुज दर्शाया जाता है तथा उनके वाहन के रूप में श्वान को स्थान दिया जाता है।

असितांग भैरव, चंड भैरव, रूरू भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाल भैरव, भीषण भैरव, तथा संहार भैरव के रूप में भी भैरव को पूजा जाता है। भैरव के इन आठ रूपों को संयुक्त रूप से अष्ट भैरव के नाम से जाना जाता है। इन आठ रूप के विषय में चर्चा हम शृंखला के आने वाले भागों में करेंगे।

क्रमशः

By तृषार

गंतव्यों के बारे में नहीं सोचता, चलता जाता हूँ.

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