विनायक दामोदर सावरकर के आत्मार्पण को समझना है तो हमें जीवन की सुन्दरता का महत्व और स्वाभाविक मृत्यु के प्रति निर्भिकता के भाव को समझना पड़ेगा। यह समझे बिना आत्मार्पण और आत्महत्या का भेद हम नहीं समझ पाएंगे।

आत्मार्पण से करीब एक साल पहले सावरकर ने मुंबई के समुद्र तट पर बाळाराव सावरकर के साथ चर्चा में वैष्णवाचार्य गौरांग के पुरी में जलसमाधि का किस्सा सुना कर अपने भावी योजनाओं का अंदाजा दे दिया था। सावरकर हमेशा ही की तरह अपने विचारों को लेकर स्पष्ट और अडिग थे।

पत्नी के स्वर्गवास के बाद सावरकर ने आत्मार्पण का निश्चय दृढ़ कर लिया उनके विचार स्पष्ट थे कि यदि मनुष्य अपने जीवन ध्येय को प्राप्त कर ले और जीर्णावस्था में शारीरिक और वैचारिक रूप से समाज को योगदान देने के लिए असमर्थ हो तब सहज आत्मार्पण से शरीरत्याग अप्राकृतिक नहीं है। आत्मार्पण से कुछ समय पूर्व मराठी सामयिक सह्याद्रि में उन्होंने लिखा था ‘आत्महत्या और आत्मार्पण’। इस आर्टिकल में उन्होंने आत्महत्या और आत्मार्पण का भेद बताते हुए विशद चर्चा की थी और तुकाराम, ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास, चैतन्य महाप्रभु, एकनाथ के आत्मार्पण का वर्णन किया था।



चंद्रगुप्त मौर्य ने भी अपने कारकिर्दी के चरम पर कर्णाटक श्रवणबेलगोड़ा में अन्नत्याग कर के जीवन यात्रा समाप्त की थी। हेरोडोटस ने लिखा है: “जब जीवन बोझ हो जाए तो मृत्यु ही मनुष्य का एकमात्र आश्रय बन जाता है” लेकिन ऐसी मृत्यु को आत्मार्पण नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह अप्राकृतिक है।

आत्मार्पण की पूर्व तैयारी रूप सावरकर ने अन्न और औषधियों का त्याग कर दिया, उपवास के अठारहवें दिन उन्होंने सबसे आज्ञा लेते हुए कहा:

आम्ही जातो आमच्या गावा, आमुचा राम राम घ्यावा।

26 फरवरी,1966 के दिन इस वीर पुरुष ने देह त्याग दिया।

प्रो• शिवाजीराव ने इसे “वैज्ञानिक समाधि” कहा। सावरकर स्वयं नास्तिक थे, उन्होंने आत्मार्पण से पूर्व अंत्येष्टि और उसके बाद किये जाने वाले धार्मिक संस्कारों के लिए मना कर दिया था और निर्देश दिया था कि उनके बाद उनके अंत्येष्टि स्थान पर कोई समाधि या स्मारक न बनाया जाए। उनके शरीर को एक आम इंसान की तरह अग्नि में समर्पित किया जाए।

सावरकर के पास आत्मार्पण के लिए मनोबल था क्योंकि उन्होंने जीवनभर संघर्षों का सामना किया था, काला पानी की भयावहता देखी थी। स्वतंत्र भारत देखना उनका स्वप्न था जो पूरा होने के बाद उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ध्येय भी पूर्ण हो चुका था। वृद्धावस्था में सामाजिक कार्य भी संभव न था।

Mercy Killing भी हत्या/आत्महत्या की तरह अप्राकृतिक मृत्यु है और आत्मार्पण प्राकृतिक तरीके से जीवन समाप्त करने का तरीका है। मर्सी किलींग की तुलना आत्मार्पण से करना कतई मूर्खता है।

लेखक: तृषार

गंतव्यों के बारे में नहीं सोचता, चलता जाता हूँ.

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Madhubala
Madhubala
3 months ago

महात्मन को शत -शत नमन जय हिंद

Namrata Tomar
Namrata Tomar
3 months ago

आपकी रचना हमेशा प्रेरणादायक होती हैं, और जो स्पष्ट भाव होते है वो रचनाओं को और भी अद्भुत बना देते हैं। धन्यवाद

Last edited 3 months ago by Namrata Tomar
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