वह गुरु पूर्णिमा की रात थी। चंद्र अपनी पूर्ण कला में प्रकाशमान होता यदि वह बादलों से घिरा ना होता। आषाढ़ की अमृत वर्षा पन्हाळगड के शिखरों को और भी शीतलता प्रदान कर रही थी। तलहटी में फैले जंगल और गाँवों में नीरव शांति पसरी हुई थी लेकिन यह शांति आने वाले भयानक तूफ़ान का अंदेशा दे रही थी। आषाढ़ की बरसात या पूर्णिमा का चंद्र ना तो पन्हाळगड किले में और ना ही तलहटी में किसी को सूकुन देने में समर्थ थे।

तेरह जुलाई की मध्य रात्रि में किले को घेरे खडी़ बीजापुर सल्तनत की विशाल सेना ने पर्वत से उतरती हुई एक शाही पालकी को देखा। संदेहास्पद तरीके से चुपचाप वह पालकी जंगल की तरफ़ बढ़ रही थी। शाही पालकी की सूचना प्राप्त होते ही बीजापुर सल्तनत के सेनापति सिद्दी मसूद के चेहरे पर कुटिल हास्य उभरा। पालकी में बैठ कर शिकार खुद चल कर मृत्यु के मुख में जो आ रहा था!

सिद्दी मसूद ने अपने विश्वासपात्र सिपाहियों को आदेश दिया और अगले कुछ ही समय में शाही पालकी समेत उसमें बैठा हिंदूत्व का रक्षक उसकी गिरफ्त में था। सिद्दी मसूद का चेहरा खिल उठा।

पालकी में सवार उस महत्वपूर्ण व्यक्ति को हथकड़ियों में जकड़ कर मसूद के सामने प्रस्तुत किया गया। राजसी पोशाक में सज्ज उस बंदी को देखते हुए मसूद बोला, “यकीन नहीं होता, इस बौने मरहट्ठे ने जोरावर अफज़ल खान का क़त्ल कर दिया था।” थोड़ी देर रूकते हुए उसने अपने सरदारों की तरफ़ देखा, उन सभी के चेहरों पर विजय का अभिमान था, बिना लड़े युद्ध जीत लिया गया था।

हथकड़ी में बंधे शत्रु की ओर देखते हुए वह बोला, “क्या सोचा था, दस हजार सिपाहियों के घेरे से बच कर भागने में कामयाब हो जाएगा? इस बार तेरा मुकाबला सिद्दी मसूद से था, अफ़ज़ल खान से नहीं…”

सफलता और मदिरा के नशे में चूर वह आगे बढ़ा। बंधक ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। मसूद जैसे जैसे आगे बढता गया, वह व्यक्ति पीछे हटता गया। उसका डर देख कर सिद्दी मसूद को अब मजा आने लगा था, वह अट्टहास करते हुए बोला, “अब पीछे हटने से कोई फायदा नहीं शिवाजी…”

मसूद जानता था कि जिस शिवाजी महाराज ने उत्तर और दक्षिण की मुस्लिम सल्तनतों की नाक में दम कर रखा था, जिसको पकड़ने के लिए मुग़ल बादशाह औरंगजेब और बीजापुर के सुल्तान ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था वह अब उसकी गिरफ्त में था।

मसूद इसलिए भी खुश था कि अब बीजापुर दरबार में चल रही आंतरिक राजनीति में भी उसका वर्चस्व बढने वाला था। शिवाजी महाराज जैसे अपराजित प्रतिद्वंद्वी को पकड़ने के बाद उसका रूतबा निःसंदेह बढ़ने वाला था।

विजय के अहंकार में वह शिवाजी महाराज की ओर आगे बढ़ा। सामने वाले व्यक्ति के पास अब पीछे हटने के लिए जगह नहीं थी। वह वहीं रुक कर आने वाले तूफ़ान का इंतजार करने लगा। मसूद अब उस व्यक्ति के बिल्कुल सामने आ खड़ा हुआ। इस एक व्यक्ति को परास्त करने के लिए वह दस हजार की सेना ले कर आया था और बिना हथियार उठाए उसने शिवाजी को परास्त कर दिया था।

मसूद ने शिवाजी महाराज के चेहरे का अवलोकन करते हुए देखा कि, उनकी तीक्ष्ण आंखों में भय का एक अंश भी नहीं था। सशक्त शरीर और राजसी परिधान में शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था, लेकिन… लेकिन… यह क्या? सिद्दी मसूद के चेहरे पर पहले डर के और बाद में क्रोध के भाव उभरे। सामने खड़ा शख्स शिवाजी महाराज नहीं थे और यह भांपते ही मसूद गुस्से से तिलमिला उठा।

“धोखा… धोखा हुआ है हमारे साथ,” वह चिल्लाते हुए बोला, “यह शिवाजी नहीं है। कौन है यह बहुरूपिया?” छावनी में एक साथ म्लेच्छ सरदारों की रक्तपिपासु तलवारें म्यान से बाहर निकल पड़ीं।

अब तक डर कर पीछे हटने का अभिनय कर रहे बहुरूपिये के चेहरे पर अब रत्तीभर भी भय नहीं था, पहले भी पीछे हटना उसके अभिनय का एक भाग मात्र थी। मसूद ने क्रोधावेश में उसकी गर्दन दबोच ली और बोला, “बता… बता कौन है तू? और कहाँ छिपा है शिवाजी?”

वह व्यक्ति बड़ी ही निर्भिकता से बोला, “मैं शिवाजी महाराज नहीं, मेरी योग्यता तो महाराज के चरणधूल जितनी भी नहीं। लेकिन महादेव की कृपा से मेरा चेहरा और शरीर सौष्ठव महाराज से मिलता-जुलता है और इसीलिए आज मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। मुझे गर्व है कि मेरा जीवन हिंदवी स्वराज्य के काम आया है।”

“****…” मसूद गुस्से से पागल हुआ जा रहा था, उसका दिमाग चक्कर खा रहा था। चतुर शिवाजी फिर से एक बार शत्रु को धोखा देने में कामयाब हो गये थे लेकिन यदि यह शिवाजी महाराज नहीं था तो यह था कौन? “कौन है तू गुस्ऊताख? बता, वर्ना अभी तेरा सिर कलम कर दूंगा।”

सामने छद्म वेश में खड़ा व्यक्ति बोला, “शिवा नाम है मेरा, शिवा काशीद। मैं हूँ महाराज का वफादार मराठा, और मराठे मौत से डरते नहीं… ” शिवा काशीद के बस इतना बोलते ही गुस्से में पागल हो चुके सिद्दी मसूद ने अपनी शमशीर उसके पेट में उतार दी। दूसरे ही क्षण शिवा काशीद का निश्चेत देह जमीन पर ढेर हो गया।

मसूद भन्ना उठा, “यदि यह शख्स शिवाजी नहीं था तो असली शिवाजी कहाँ है? क्या वह अभी भी घेरे में ही है या भागने में कामयाब हो गया है?” दूसरे ही क्षण मसूद अपनी छावनी से बाहर था। घोड़े पर सवार महाकाय सिद्दी मसूद के हाथ में शिवा काशीद के रक्त से सनी तलवार थी जिसके रक्त की प्यास अभी भी बुझी नहीं थी। आषाढ़ी पूर्णिमा का पूर्वार्ध समाप्त हुआ लेकिन उत्तरार्ध अभी बाकी था। (क्रमशः)

लेखक: तृषार

गंतव्यों के बारे में नहीं सोचता, चलता जाता हूँ.

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Dwarika
Dwarika
4 months ago

लेखन❣️❣️

सुनील
सुनील
4 months ago

नमन भारत के वीरों को

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