तमिलनाडु को मंदिरों का देश कहा जाये तो अतिशियोक्ति नही होगी। इस राज्य मे अनेक ऐसे भव्य नगर हैं जो टेंपल टाउन कहे जाते हैं। ऐसी ही एक छोटी सी नगरी है मदुरांतकम! ये तमिलनाडु के चेंगलपेट जिले में स्थित है और राज्य की राजधानी चेन्नै से कुछ ८० किलो मीटर दूर है।

इसे अपने मुख्य मंदिर एरि कात्त रामर मंदिर के कारण टेंपल टाउन कहा जाता है। यह वैष्णव मंदिरों की श्रृंखला में रामानुज मंदिरों की श्रेणी में आता है। इस मंदिर को मथुरांतक चतुर्वेदी मंगलम, वैकुंठ वरदनम, थिरुमथुरई,द्वैम विलिंध तिरुपति, करुणाकर विलगम नामों से भी जाना जाता है।

किन्तु इस छोटी नगरी के स्थल का अति विशिष्ट व विस्तृत इतिहास है जिसकी जानकारी प्रचलित नहीं है। कहा जाता है कि इस स्थल पर सतयुग से अविरत पूजन अर्चन चला आ रहा है । वैष्णवों के लिये यह एक तीर्थ स्थल है, पुण्य भूमि है।

वर्तमान – एरि कात्त रामर मन्दिर

एरि कात्त रामर का अर्थ है झील के संरक्षक राम। एक घटना विशेष के बाद ये नाम राम के प्रति प्रेम और धन्यवाद के रूप मे दिया गया है। इसकी कथा हम आगे बताएंगे। इसका मूल नाम कोदण्ड रामर है जिसका अर्थ है धनुर्धारी राम । इस मन्दिर के मुख्य देवता, सीता तथा लक्ष्मण के साथ धर्नुधारी राम हैं। इन विग्रह को मूलवर कहा जाता है, क्योंकि ये प्राण प्रतिष्ठित हैं।

गर्भगृह में सबसे आगे श्री, भू देवी सहित करुणाकर पेरुमल (विष्णु) के अत्यन्त मनोहारी और प्राचीन उत्सव विग्रह को देख सकते हैं।ऐसा कहा जाता है कि यह रामचंद्र जी की आराधना मूर्ति थी। फिर अगले उच्च आसन में सीता लक्ष्मण सहित कोदंडराम अर्थात् धनुर्धारी राम की उत्सव मूर्ति स्थित हैं। अंत में आपको सीता लक्ष्मण सहित कोदंडरामर मूर्ति का मूलवर मिलेगा। मूलवर लगभग आठ फुट ऊँची स्थापित विग्रह हैं जिसके मुख पर मुस्कान है।

यहाँ कहा जाता है कि वह सुसज्ज गृहस्थ के रूप में उपस्थित हैं क्योंकि केवल मदुरांतकम स्थित विग्रह में उन्होंने सीता माता का हाथ पकड़ा हुआ है।

वैष्णव सम्प्रदाय के आगमशास्त्रों के अनुसार यहाँ नियमित व शास्त्रीय पूजा होती है।अर्चकों के छह मुख्य परिवार हैं जिनके वैष्णव पंच-संस्कारित तथा परंपरागत पथ्य चर्या का विधिवत पालन करने वाले पुरुष सदस्य, देवपूजा, अनुष्ठान, तथा मंदिर के समस्त कार्यों का दायित्व निर्वहन करते हैं।यह सभी वेदपाठी ब्राह्मण हैं। अनुष्ठान आदि संस्कृत में होते हैं और आळवार आदि रचित अनेक तमिल भक्ति रचनाओं का सुमधुर स्वर में विभिन्न अवसरों पर गायन होता है।

 इस मन्दिर का निर्माण कुछ 1600 वर्ष पूर्व पल्लवों के काल में हुआ बताते हैं। चोल वंश के राजा उत्तम चोला ने इसे सम्पन्न करा (973-85 CE)l उन्हें अपने शासनकाल में मदुरान्तक कहा जाता था, इसी कारण इस नगर का नाम मदुरान्तकम पड़ा । ऐसा कहा जाता है कि उससे पहले चोल राजा परंतक के पुत्र गण्डरादित्य ने यह गाँव चतुर्वेदी वैदिकों को दान कर दिया था। इसीलिए इस मंदिर स्थल का एक नाम चतुर्वेदी मंगलम भी है। शायद उसी समय से यहाँ वेद पाठ का आरम्भ हुआ हो !

द्रविड शैली में बने इस वैष्णव देवालय का मुख्य द्वार अर्थात् राजगोपरम, पूर्व दिशा में स्थित है। मंदिर के विपरीत एक छोटी पुष्करणी (मंदिर का तालाब) है और द्वार के सामने कुछ दायीं ओर हनुमान जी का छोटा सा देवालय है जिन्हें सीरिय एतिरुवाड़ी कहते हैं।हनुमान मंदिर के बायीं ओर  प्रतिष्ठित अहोबिल मठ वेद पाठशाला स्थित है। 

मंदिर में प्रवेश करने पर सबसे पहले ध्वजस्तंभ के दर्शन होते है।

स्तंभ के शिखर पर यह तीन पट्टियाँ धर्म, समृद्धि और प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, विशेष उत्सवों पर ध्वजारोहण इनसे नीचे होता है। 

स्तम्भ के आगे गरुड़ की करबद्ध मूर्ति का छोटा सा कक्ष है जिसका मुख मूलवर की ओर है। मंदिर के भीतरी प्रांगण में स्तम्भों पर विष्णुके विभिन्न रूपों के चित्र उकेरे हुए हैं । जैसे ये पृथ्वी (भूदेवी) को समुद्रतल से लाते वराह अवतार !

इस देवालय की विशेषता यह है कि इस प्रांगण में कई विग्रह है जिन्हें सन्निधि कहते हैं। प्रत्येक सन्निधि  के अपने देवालय कक्ष हैं और परिक्रमा वीथी है। यदि बायीं से दायीं ओर प्रदक्षिणा करते हुए चलें तो सबसे पहले सुदर्शन चक्र की सन्निधि है।

यह चित्र सुदर्शन सन्निधि के बाहर के मण्डप में ब्रहमोत्सव के समय का है। अहोबिल मठ की पाठशाला के विद्यार्थी यहाँ दिख रहे हैं।

वैष्णव सुदर्शन को विष्णु का अवतार मानते हैं। दूर से देखने पर यह नटराज का विग्रह जान पड़ता है किंतु समीप जाने पर स्पष्ट रूप से षोडश आयुध(सोलह शस्त्र) धारी सुदर्शन स्वरूप के दर्शन होते हैं। मंदिर में अन्य प्राचीन विग्रहों की तरह यह भी विशेष धातु-पाषाण मिश्रण से बना विग्रह है।इसकी एक विलक्षणता है कि यह दो ओर से दो भिन्न रूपों की मूर्ति है। सामने की ओर सुदर्शन और पीछे की ओर उग्र नरसिंह का रूप है, नरसिंह विग्रह को शालिग्राम शिलाओं की माला पहनायी हुई है।

उनसे आगे चलें तो वेदांत देशिक की सन्निधि है, जो रामानुजाचार्य के बाद वैष्णवों के सबसे प्रभावशाली आचार्य हुए।उन्होंने कई वेद वेदान्तिक व्याख्यायें लिखीं है और जो तमिल संस्कृत प्राकृत आदि कई भाषाओं के विशारद थे। इनके आगे आळवार सन्निधि स्थित है ( यहाँ नौ आळवार हैं)। इनके आगे एक विशेष छोटी सी अलग सन्निधि दिखाई देती है जो जनकवल्ली तायार की सन्निधि है ।

जनकवल्ली अर्थात जनक की पुत्री – जानकी या सीता । दक्षिण के देवालयों में विष्णु की पत्नी का अलग छोटा देवालय मूलवर के दायीं ओर होता है, जैसे रनिवास होता है। यहाँ वह तायार या माँ के रूप में निवास करती हैं। (देवालय आने पर पहले उनके दर्शन करे जाते हैं क्योंकि वह माँ हैं और फिर मुख्य गर्भ ग्रह को जाते हैं।)

प्रदक्षिण जारी रखें तो देवालय के दक्षिणी पश्चिमी कोने में पहुँचते हैं जहाँ एक प्राचीन बकुल वृक्ष है (मौलसीरि का पेड़) और उसी के पास एक मण्डप है जिसके पीछे दीवार पर किशोर रामानुजाचार्य का अपने गुरु पेरिया नंबीगल से दीक्षा प्राप्त करते हुए चित्र है। स्पष्ट दिखता है कि इस चित्र का जीर्णोद्वार होता रहता है।

अब तक मन्दिर तीन चौथाई परिक्रमा हो चुकी है। पुनः पूर्व की ओर चलें तो अंडाल गोदादेवी (एकमात्र स्त्रीआळवार) पेरिया आळवार (प्रथमआळवार)और नामाळवार (आंडाल के पिता) लिए एक छोटी सन्निधि है। इन्हें मिला सभी बारह आळवार के विग्रह इस प्रागंण में उपस्थित हैं।

इसके बाद दाएं मुड़ें तो पेरुमाळ अर्थात् विष्णु की सन्निधि स्थित है। जिसके द्वार पर द्वारपालक जय और विजय की विशाल मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह का वर्णन ऊपर किया गया है। गर्भगृह प्रागंण में चोल राजा परंतक के द्वारा दिए कई उपहारों के आलेख- शिलालेख हैं। 

यदि मुख्य मूलवर के प्रति दाईं ओर ना मुड़कर प्रदक्षिणा जारी रखें तो छोटे से गोचर मैदान के टुकड़े के बाद पेरिया थिरुवदी के लिए एक छोटी सन्निधि मिलेगी। उसके आगे गुरु और शिष्य अर्थात् रामानुजाचार्य और उनके गुरु पेरिया नाबिंगल की सन्निधि है जहां उनके स्थापित और उत्सव विग्रह हैं। यह एकमात्र स्थान है जहां सर्व भवमान रामानुजन को गृहस्थ पोशाक (वेलई सथुपदी / श्वेत धोती) में देखा जाता है और यह एकमात्र स्थान है जहाँ उन्हें उनके गुरु के साथ देखा जा सकता है।

दोनों के उत्सव विग्रह के बीच में झूले में लड्डू-गोपाल (डोलई कन्नन) विराजमान हैं और उनके दोनों ओर वैष्णव संप्रदाय के मुख्य चिन्ह शंख (जिसे पान्चजन्य कहते हैं) और चक्र रखे हैं। बताया जाता है कि ये पेरिया नाम्बीगल द्वारा नित्य पूजित थे और इन्ही शंख – चक्र से गुरु ने रामानुजाचार्य का पंच संस्कार किया था। ये गर्भ गृह के समीप एक सुरंग में पाए गए थे। ये सुरंग मदुरंतकम एरि यानि झील तक जाती थी, अब यह स्थायी रूप से बंद है।

फिर अंतिम सन्निधि भगवान लक्ष्मीनरसिंह की है (शान्त नरसिंह रुप जिनकी गोद में लक्ष्मी विराजमान हैं)। नरसिंह इस पूरे वकुल क्षेत्र के प्राचीन देवता हैं। भक्तों को प्रतीत होता है मानो अद्भुत केसरी शान से बैठे हैं और कह रहे हैं कि मैं आपकी रक्षा करने के लिए हूं, आप चिंतित क्यों हैं। इसके पश्चात एक बड़ा कक्ष है, रथयात्रा के समय उत्सव विग्रह के विराजमान होने और विश्राम करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इस कक्ष के विपरीत (सुदर्शन चक्र के विग्रह के दाईं ओर) मंदिर की रसोई है, जहां नित्य प्रसाद बनता है।
बाहर मुख्य सड़क की पश्चिम की ओर यात्रा करते हैं तो प्रसिद्ध “मदुरांतकम एरि” देखी जा सकती है, जिसे भगवान राम और लक्ष्मण ने संरक्षित किया था।

कोदंड रामर के “एरि कात्त रामर” मन्दिर क्यों कहा जाता है?

सन 1795 और 1799 के बीच की अवधि के दौरान चिंगलेपुट जिले के कलेक्टर कर्नल लियोनेल ब्लेज़ नामक एक ब्रिटिश अधिकारी थे। अपनी नियुक्ति के दौरान, ब्लेज़ विशाल टैंक या झील में दो बार दरारें देख चुके थे। समस्या की विकरालता का अंदाजा तभी लगाया जा सकता है जब हम टैंक के बड़े आकार के बारे में जानते हों।

13 वर्ग मील (34 किमी२) के क्षेत्र और 21 फीट (6 मीटर) की गहराई के साथ, मूसलाधार बारिश के बाद टैंक का टूटना किसी भी अधिकारी के लिए दुःस्वप्न था। कलेक्टर ने वर्ष 1798 में पूर्वव्यापी कार्रवाई की इच्छा रखते हुए मदुरांतकम में डेरा डाला। अपने प्रवास के दौरान, कलेक्टर दरारों की तत्काल मरम्मत करने के तरीके और साधन तलाश रहे थे, यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए तो!

अपने निरीक्षण के दौरान, उन्होंने राम मंदिर के परिसर में ग्रेनाइट और अन्य पत्थरों का एक बड़ा संग्रह देखा। कलेक्टर ने अपने अधीनस्थों से कहा कि इन्हें बांधों के जीर्णोद्धार में उपयोग में लाया जा सकता है। यह सुनकर मंदिर के पुजारियों ने कहा कि पत्थर जनकवल्ली तायार के लिए एक अलग मंदिर के निर्माण के लिए थे और चूंकि धन की कमी थी इसलिए निर्माण शुरू नहीं हो सका।

कहा जाता है कि यह सुनकर कलेक्टर ने टिप्पणी की कि एक अलग धर्मस्थल की आवश्यकता कहाँ थी जब बांधों की मरम्मत जैसे अधिक जरूरी काम संसाधनों के लिए रो रहे थे।उसने अर्चकों से भी कटाक्ष कर पूछा कि क्यों प्रभु हर साल झील को बचाने में सक्षम नहीं थे? पुजारियों ने यह कहते हुए उत्तर दिया कि भगवान हमेशा दिल से एक सच्ची प्रार्थना का उत्तर देने के लिए जाने जाते हैं।

बारिश आई और खूब बरसी! कुछ ही दिनों में टैंक पूरी तरह से भर गया और एक दरार आसन्न लग रही थी। उस रात चिंतित कलेक्टर ने इस उम्मीद से टैंक के पास डेरा डाल दिया कि मेड़ पकड़ में आ जाएगा। जब वह निरीक्षण कर रहे थे, कर्नल ब्लेज़ ने एक चमत्कारी दृश्य देखा। उन्हें धनुष और तरकश लिए हुए दो योद्धा मेड़ों की रखवाली करते दिखाई दिए।

ब्रिटिश अधिकारी ने अपने घुटनों पर जाकर प्रार्थना की, क्योंकि वह जान गया था कि यह कोई और नहीं बल्कि भगवान राम और उनके दिव्य भाई लक्ष्मण थे। यह वास्तव में अजीब था कि किसी और ने, जो कलेक्टर के कर्मचारियों का समूह था, भगवान को नहीं देखा। कुछ देर बाद वह दृश्य भी ओझल हो गया और वर्षा भी थम गई। बांध नहीं टूटा।

कृतज्ञ कलेक्टर ने जनकवल्ली तायार के लिए मंदिर का निर्माण किया और मंदिर में भगवान राम को एरि कात्त रामर (झील बचाने वाले राम) के रूप में जाना जाने लगा। मदुरंतकम मंदिर में आज भी कलेक्टर के नाम के साथ उन्हें एक परोपकारी के रूप में उद्धृत किया जाता है।

त्रेता युग और राम से इस क्षेत्र का विलक्षण सम्बंध जो इसे दक्षिण की अयोध्या की ख्याति दिलाता है।

 मदुरांतकम का क्षेत्र प्राचीन समय में वकुलारण्य कहलाता था, यहां बकुल के यानी मौलसीरि के वृक्षों की बहुलता थी। वैष्णव मान्यता है कि इसी बकुल क्षेत्र में विभंडक ऋषि का आश्रम था। विभंडक ऋषि, कश्यप ऋषि के वंशज थे और रामायण कालीन ऋषि ऋष्यश्रृंग के पिता माने जाते हैं।

ऋषि ऋष्यश्रृंग वही हैं जिन्होंने राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया था जिसके पश्चात दशरथ को राम सहित अपने चार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी और जिनसे श्री राम की बहन शांता का विवाह हुआ था।

लंका में सीता के होने की सूचना के पश्चात्, लंका की ओर जाते हुए राम ऋषि विभंडक के इस वकुलारण्य  स्थित आश्रम में रात्रिवास के लिए रुके। ऋषि विभंडक करुणाकर स्वामी यानि विष्णु की पूजा करते थे।

ऋषि विभंडक ने राम को आश्वस्त किया कि उनकी विजय होगी और उन्हें कहा कि वापसी के समय यहां अवश्य होते हुए जाएं। लंका विजय के पश्चात सीता को पाकर राम इतने हर्षित थे कि उन के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर अयोध्या के लिए निकल पड़े और उन्हें यह स्मरण नहीं रहा कि उन्हें ऋषि विभंडक के आश्रम में जाना था। इस कारण लौटते समय वकुलारण्य के पास एक पर्वत से पुष्पक विमान टकराया, तब श्री राम को बोध हुआ कि वह ऋषि के आश्रम में जाना भूल रहे हैं। 

उस पर्वत को अब ज्ञानगिरि कहा जाता है क्योंकि उस से टकराने के बाद श्री राम को यह ज्ञान हुआ कि उन्हें ऋषि विभंडक के आश्रम जाना है। राम ने पुष्पक विमान को आश्रम के समीप उतरने का आदेश दिया और वह सीता का हाथ पकड़े हुए ऋषि के आश्रम में गए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके पुनः अयोध्या के लिए प्रस्थान किया।

इस स्थान की महत्ता यह है कि रावण पर विजय के पश्चात सबसे पहले राम और सीता के चरण वकुलारण्य के इस क्षेत्र पर पड़े थे। इसी कारण इस देवालय में स्थापित राम के विग्रह ने सीता का हाथ पकड़ा हुआ है, यह पूरे भारत में एक ही ऐसा मंदिर कहा जाता है जहां पर श्री राम और सीता के विग्रह के हाथ मिले हुए हैं। इस प्रकरण का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के वर्तमान संस्करणों में नहीं मिलता है। 

वैष्णव मान्यता के अनुसार श्री रामचंद्र करुणाकरस्वामी और श्री, भूदेवी की उपासना करते थे और अपने वैकुंठ जाने के समय पर उन्होंने हनुमान को यह आदेश दिया कि यह विग्रह अब ले जाकर वकुलारण्य क्षेत्र, ऋषि विभंडक के आश्रम में स्थापित कर दिए जाएं। हनुमान जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया। देवालय के गर्भ ग्रह में रखे श्री, भूदेवी सहित करुणाकर स्वामी के विग्रह राम के द्वारा पूजित विग्रह माने जाते हैं। इसी कारण इस मंदिर में मूलवर रामचन्द्र होने पर भी यहाँ  श्री व भूदेवी सहित करुणाकर स्वामी की भी सीता व लक्ष्मण सहित कोदंड राम के समकक्ष  पूजा होती है।

वैष्णवों का अभिमान स्थल

वैष्णवों के मुख्य 108 विष्णु रूपों के मंदिर हैं। जिस किसी मंदिर में आळवार ने विष्णु की स्तुति गायीं हैं, वह 108 मुख्य मंदिर माने जाते हैं। एरिकात्त रामर मंदिर में किसी आळवार ने नहीं गाया परन्तु यह वैष्णवों का तीर्थ इसलिए है कि यहाँ रामानुजाचार्य को दीक्षा प्राप्त हुई थी।

यह बकुल वृक्ष के नीचे का स्थान है, जहां श्री रामानुजर को उनके गुरु पेरिया नंबीगल द्वारा “पंच संस्कार” (दीक्षा) दिया गया था। जिसके बाद मदुरंतकम को “द्वैम विलिंध तिरुपति” नाम दिया गया था। इस ऐतिहासिक घटना का विवरण वैष्णव कुछ इस प्रकार बताते है। तिरुकाची नांबी के माध्यम से कांची वरदराजर का दिव्य आदेश प्राप्त करने पर, वैष्णव संत रामानुज ने श्रीरंगम को पेरिया नंबीगल का शिष्य बनने के लिए निर्धारित किया।

पेरिया नांबिगल रामानुज को श्री आलनवंदर के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने के लिए कांचीपुरम जा रहे थे।रामानुज पेरिया नंबी से मिलना चाहते थे और उन्होंने कांचीपुरम से यात्रा आरंभ करी और पेरिया नंबी ने श्रीरंगम से यात्रा आरंभ की। एक दिन तमिल अवनी मास के शुक्ल पक्ष, पंचमी के दिन पेरिया नांबिगल मदुरांतकम पहुंचे और इसलिए हमारे रामानुज भी। फिर वे दोनों मदुरांतकम झील के किनारे मिले और फिर एक-दूसरे का अभिवादन किया और दोनों ने एक-दूसरे को भगवान देवदिराजन और नम्पेरुमल की दिव्य आज्ञा से अवगत कराया।

तमिल मास अवनी-आड़ी जैसे उत्तर भारत में आषाढ़ श्रावण।नांबिगल रामानुजर के शब्दों से प्रभावित हुए। झील में स्नान कर वे मंदिर गए और फिर भगवान कोथंदराम और उनके आराध्य पेरुमल करुणाकर से प्रार्थना की। जनकवल्ली तायार के दर्शन कर और फिर मंदिर के पीछे बकुल के वृक्ष के पास गए, वहाँ नंभीगल ने अपने भगवान श्रीकृष्ण की आराधना मूर्ति को निकाला और चार स्तंभों वाले मण्डप में  पंचसंस्कार के नाम से जाने जाने वाले सभी पांच अनुष्ठानों का संचालन किया।

ये पंच संस्कार या समास्रयानम होते हैं – शंखचक्रांगनम,  उध्वपुधारा दारानम, दस्य नमम, यज्ञसंस्कारम और द्वैम का मंत्रथ्रत्नम। इसी कारण यहां रामानुजाचार्य का विग्रह गृहस्थ द्वारा धारण करी जाने वाली श्वेत धोती में देखे जाते हैं।

प्रतिवर्ष इसी तिथि, अवनि के मास की शुक्ल पंचमी पर, ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। 

करुणाकर पेरुमल को पेरिया पेरुमल के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वे श्री रामचंद्र की आराधना मूर्ति थे। यहां सभी उत्सव करुणाकर पेरुमल के लिए ही आयोजित किए जाते हैं। रथ यात्रा के समय भी करुणाकर स्वामी और श्रीदेवी भूदेवी के उत्सव विग्रह को ही नगर में यात्रा कराइ जाती है।

रामचंद्र उत्सव विग्रह के लिए वर्ष में केवल दो दिन उत्सव आयोजित किया जाता है। वह इस दो दिनों के दौरान पांच अलग-अलग अलंकार में सेवा देते हैं। श्रीरामनवमी के दौरान श्रीरामनवमी के दिन और आनी मास में 7 वें दिन मूल नक्षत्र पर श्री राम चंद्र मूर्ति का उत्सव होता है।

उस समय वैष्णवों का उदयवार पंचसंस्कार होता है। प्रत्येक मास पुर्नवसु नक्षत्र राम के जन्म नक्षत्र के दिन गर्भगृह के प्रागंण में रामचन्द्र उत्सवविग्रह का विधिवत अभिषेक होता है तथा उनकी स्तुतियाँ गायी जातीं हैं। यहाँ माइक जैसे आधुनिक उपकरणों का कि प्रयोग नहीं होता, पारंपरिक वाद्यों का ही प्रयोग होता है।

आशा है इस लेख के माध्यम से पाठक ने भी संतोषजनक दर्शन प्राप्त करे होंगे।

आभारः
अधिकतर जानकारी लेखक द्वारा स्वयं एकत्रित करी गयी है और चित्र भी स्वयं लिये गये हैं। अन्य चित्रों विशेषकर गर्भगृह के विग्रह यहाँ दी गयी वेब्सायट से लिये गये हैं, जिसे मदुरान्तकम के कुछ मूलनिवासी वैष्णवों द्वारा बनाया गया है। मंदिर परिसर में सामान्य जन का विग्रह का फ़ोटो लेने वर्जित है।

  • जानकारी के माध्यम:
  • मदुरान्तकम देवालय के अर्चक, परिवार
  • पाठशाला आचार्य
  • मूल निवासी
  • मंदिर आलेख
  • http://www.madhuranthakam.ramanujartemples.net/pg.htm

लेखक: Anshu Dubey

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क्रिया योग
क्रिया योग
1 month ago

सुंदर और विस्तार वर्णन किया है इस पवित्र स्थान का
मंदिर के परिसर में मधुर नादस्वरम थविल के संग सुनने का अनुभव कुछ अलग ही है

धन्यवाद अंशुजी

Hemant Kumar Sharma
Hemant Kumar Sharma
1 month ago

अंशु जी आपके द्वारा सनातनी धरोहरों पर विस्तृत जानकारी का यह अद्भुत संकलन एक बहुत ही
सराहनीय प्रयास है। निश्चित रूप से आपका यह प्रयास न केवल हमें हमारी समृद्ध संस्कृति से अवगत कराता है ब्लकि हमें इन स्थानों के भ्रमण के लिए भी प्रेरित करता है। साधुवाद।

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