Shyamji Krishna Varma

कच्छ रियासत के महाराव का ग्रीष्म कालीन निवास स्थान, मांडवी। गुजरात के समुद्र तट पर स्थित यह छोटा सा किलेबंद नगर पिछले चार सौ वर्षों से जहाज़ निर्माण में अग्रसर रहा है। लेकिन प्रवासियों के लिए इस जगह के आकर्षण हैं मांडवी समुद्र तट और विजय विलास पैलेस। विजय विलास पैलेस बॉलिवुड इंडस्ट्री की फिल्मों के शूटिंग के लिए आदर्श स्थान होने की वजह से टूरिज्म का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

इतने आकर्षणों के बावजूद जब मैं मांडवी पहुंचा तो मेरा लक्ष्य इनमें से कोई पर्यटन स्थल नहीं था। मांडवी पहुंचते ही हमने नगर से बाहर मांडवी-धारबुडी रोड पर तीन किलोमीटर दूर स्थित क्रांति तीर्थ के लिए ऑटो किराए पर ले लिया। समुद्र किनारे वाले रास्ते से ठंडी हवाओं का आनंद लेते हुए ऑटो रिक्शा आगे बढ़ रहा था तभी रास्ते पर लाल रंग की उंची इमारत दिखते ही मेरा मन रोमांचित हो उठा।

विदेश में क्रांति की चिंगारी जलाने वाले और सैंकड़ों क्रांतिकारियों के पितामह श्यामजी कृष्ण वर्मा की पुण्य-स्मृति रुप अस्थि-कलश के दर्शन और “इण्डिया हाऊस” की प्रतिकृति देखने का मोह मुझे यहां तक खींच लाया था।  लेकिन यह आनन्द क्षणभंगुर था। इमारत का गेट बन्द था। पापा ने निराशा से मेरी ओर देखा।

गेट पर लगी नोटिस पर लिखा था कि मेंटेनेंस कार्य चल रहा था और दो दिन तक क्रांति तीर्थ मुलाकातियों के लिए बन्द रहेगा। गेट की दूसरी तरफ ब्रिटेन में भारतीय क्रांतिवीरों के निवास स्थान इण्डिया हाऊस की प्रतिकृति खड़ी थी और गेट के इस ओर मैं निराशा से उसे देख रहा था।

मैंने पीछे मुड़कर पापा की ओर देखा वो भी नि:सहाय दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे। जब आप भरसक प्रयास से किसी स्थान पर पहुंचें और उस जगह को देख ना पाएं तो निराशा स्वाभाविक है।

ऑटो में वापस बैठने से पहले मुझे एक बार श्यामजी कृष्ण वर्मा के कार्यों को कृतज्ञ वंदन करने का मन था। गेट के सामने ही मैं घुटनों के बल बैठ गया और दोनों हाथ जोड़ कर जमीन पर सर रख दिया। ऑटो वाला विस्फारित आंखों से मेरा पागलपन देखता रहा। मुझे प्रणाम करते देखा तो पिताजी भी ऑटो से उतरे और उन्होंने भी क्रांति तीर्थ को नमन किया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का वो नाम हैं जिन्हें गांधी-नेहरू की आंधी में कहीं गुमनाम कर दिया गया।  वे पहले भारतीय थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-लॉ की उपाधियाँ मिलीं थीं। संस्कृत के विद्वान वर्मा, लोकमान्य तिलक और दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए थे।

जब हम पीछे मुड़कर ऑटो में वापस बैठ रहे थे तभी गेट से बूढ़ी आवाज में किसी ने रोकते हुए कहा “थोभो!” (रूको)

एक वृद्ध किन्तु तेजस्वी आदमी हाथ उठा कर हमें रोक रहा था। उनके चेहरे की झुर्रियों से उनकी आयु करीब पचहत्तर वर्ष की होने का अनुमान लगाया जा सकता था। धवल वस्त्रों के साथ-साथ उनके बालों पर भी सफेदी छाई हुई थी। उनका शरीर कृशकाय था लेकिन उनकी आवाज भारी और शब्द स्पष्ट थे।

उन्होंने मुझसे वहां आने का प्रयोजन पूछा। मैंने उन्हें सिर्फ एक वाक्य में उत्तर देते हुए कहा “हम यहां उन महापुरूष के दर्शन करने आए हैं जिनके अस्थि-कलश ने मातृभूमि के विरह में 73 वर्षों तक प्रतीक्षा की है।” मेरा उत्तर सुनते ही उन्होंने वॉचमैन को आदेश दिया “गेट खोल दो।”

31 मार्च 1930 को जेनेवा में मृत्यु के पश्चात अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के कारण श्यामजी कृष्ण वर्मा का शव भारत नहीं लाया जा सका और वहीं उनकी अन्त्येष्टि कर दी गई। उनके अस्थि-कलश को वहीं सुरक्षित रखा गया। स्वतन्त्रता के 55 वर्ष बाद 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदीजी के प्रयासों की बदौलत जिनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी भानुमती की अस्थियों को भारत लाया गया। 

परिसर में प्रवेश करते ही वृद्ध ने मेरा हाथ पकड़ लिया और हम लोग एम्फिथिएटर की ओर आगे बढ़े। वो बड़े उत्साह से एक एक जगह दिखा रहे थे और मेरे साथ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की चर्चा कर रहे थे। परिसर की एक ओर एम्फिथिएटर था, सामने इण्डिया हाऊस की प्रतिकृति और मध्य में उद्यान में श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा उनकी पत्नी भानुमती देवी की बड़ी प्रतिमा थी।

उद्यान को मेडम भिकाइजी कामा, तिलक और गोखले जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाओं से सजाया गया था। उद्यान से होते हुए हम तीनों इण्डिया हाऊस के दरवाजे पर पहुंचे, उन्होंने जेब से चाबी निकाली और दरवाजा खोला।

दरवाजा खुलते ही हमारे समक्ष था भारत के क्रांति यज्ञ में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले मदनलाल धींगरा जैसे महापुरुषों का बलिदान। मुख्य खण्ड में लगी तस्वीरें देखते हुए हम आगे बढ़े। भारतीय क्रांति के इतिहास की चर्चा करते हुए कब हम लोग इतिहास के साक्षी बने यह हमें ज्ञात नहीं रहा।

समय की सीमाओं को लांघ कर हम उस दौर में पहुंच गए थे जब इंग्लैंड में अपनी देश से हजारों किलोमीटर दूर कुछ देशभक्त अपनी भारत माता की मुक्ति के लिए जी-जान से जुटे हुए थे। कोने में एक छोटे-से कमरे में कुछ युवा विस्फोटक बनाने का साहित्य जमा कर रहे थे। एक और कमरे में कुछ क्रांतिकारी अपने भारतीय साथियों के लिए किताबों में छुपा कर बंदूकें सप्लाई करने की योजना बना रहे थे।

हर कमरे में सरफिरों की टोलियां अपने कार्यों में मग्न थी। ऊपरी मंजिल पर स्थित छोटे से पुस्तकालय में एक दुबला-पतला सा युवक किसी गहन अध्ययन में मग्न था। हम जैसे ही पुस्तकालय में पहुंचे उसने सर उठा कर हमारी ओर देखा और फिर से अभ्यास में जुट गया। ऐनक के पीछे से झांकती उसकी स्थितप्रज्ञ आंखों में एक अजीब सी चमक थी।

इण्डिया हाऊस के पुस्तकालय में बैठ कर ही विनायक दामोदर सावरकर नाम से मशहूर इस युवक ने 1857 के महायुद्ध की गाथा लिखी जिसे प्रकाशन से पहले ही वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित कर दिया गया। बाद में इसी पुस्तक की प्रतियों को येन-केन प्रकार से भारत पहुंचाया गया जहां इसकी हस्तप्रति ने भारतीय जनता में क्रांति की चिंगारी लगा दी।

इण्डिया हाऊस की प्रतिकृति से बाहर एक बड़े हिस्से को श्यामजी कृष्ण वर्मा स्मृति स्मारक बनाया गया है। इसी खण्ड में विदेश में भारतीय क्रांति का ध्वज लहराने वाले और अनेक क्रांतिकारियों को आश्रय देने वाले वर्माजी और उनकी धर्मपत्नी के अस्थियों को पर्यटकों के दर्शनार्थ रखा गया है।

अब क्रांति तीर्थ से विदा लेने का समय था। वृद्ध मुळजी भाई की सहायता से हमारी क्रांति तीर्थ यात्रा सफलता पूर्वक संपन्न हुई थी। मैंने आभार व्यक्त करते हुए उन्हें करबद्ध प्रणाम किया और जैसे ही मैं उनके चरणस्पर्श करने के लिए झुका उन्होंने भावावेश में मेरे दोनों कंधों से उठा कर मुझे अपने गले लगा लिया।

उन्होंने मुझसे कहा “हमारा भारत अब एक स्वाधीन राष्ट्र है लेकिन हमारी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति से ज्यादा दुष्कर है स्वतंत्रता को बनाए रखना और बिना राष्ट्र-चेतना के यह कदापि संभव नहीं है। इस राष्ट्र को समर्पित युवाओं की आवश्यकता है।”

मैंने प्रश्नार्थ द्रष्टि से उनकी तरफ देखा, “मैं एक अदना सा सॉफ़्वेटयर इंजीनियर क्या ही कर सकता हूं। मैं सिपाही नहीं जो सरहदों पर जा कर अपना योगदान दे पाऊं।”

उन्होंने कहा “तुम्हारे पास ज्ञान है, इसका प्रसार करो। अपनी धरोहरों को, अपने इतिहास को लोगों तक पहुंचाने का काम करो। इतना तो कर ही सकते हो।” मैंने सहमति में सर झुकाया और हम वापसी के लिए प्रशस्त हुए।

मैं नहीं जानता कि मैं अपना वचन निभाने में कितना सफल रहा हूं पर मैं प्रयासरत हूं, मैं प्रयासरत रहूंगा।

लेखक: तृषार

गंतव्यों के बारे में नहीं सोचता, चलता जाता हूँ.

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सात्विक
सात्विक
1 year ago

पढ़ते पढ़ते रोना आ गया, ऐसी न जाने कितनी ही विभूतियां है जिनकी गाथाओं से न जाने कितने पुराण भरे जा सकते हैं किन्तु हाय रे दुर्भाग्य भारत का कि ऐसी गाथाओं को भारतीय इतिहास में जगह न मिली।
धन्य हैं आप तृषार भाई, शायद आपको ईश्वर ने यह बचा हुआ काम करने के लिए चुना है।
एक बात और वीडियो में कहानी सुनाते हुए आप और ज्यादा जमेंगे।
प्रणाम

भूपेंद्र सिंह
भूपेंद्र सिंह
1 year ago

आपके लेखों को पढ़कर रोमांच के साथ-साथ अपने देश के बहुधा विस्मृत स्वातंत्र्य वीरों के बारे में ज्ञान मिलता हैं। और आपका यह प्रयास वंदनीय इसलिए भी हैं क्योंकि आज के इस युग में मात्र कुछ लोग ही अपनी इन भूली हुई धरोहरों को हम जैसे लोगो तक पहुँचाने का बीड़ा उठाये हुए हैं। आपके प्रयास आपकी मनोकांक्षाओं में सफल हो, आपके लिए ऐसी मेरी शुभेच्छाऐं हैं।

Last edited 1 year ago by भूपेंद्र सिंह
Pushpa Chaturvedi
1 year ago

सर बहुत अच्छा लिखा है आपने, आप प्रशंसा के पात्र है ऐसे अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिनके नाम तक हम लोगो को पता नहीं। कुछ खास लोगों को ही प्रसिद्धि और कुर्सी मिली बाकी सब आतीत के धरोहर में खो गए, आप उन धरोहरों और महापुरुषों को सबके समक्ष लाने का बड़ा नेक कार्य कर रहे हैं। आभार

Arunkumar
Arunkumar
1 year ago

मन भाव विभोर हो गया, गला भर आया, सीना चौड़ा हो गया और दबे हुए इतिहास को शिखर पहुंचना है जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम

Milind Nigudkar
Milind Nigudkar
1 year ago

लोमहर्षक वृतांत वास्तव में हमारे देश में बहुत से क्रांति वीरों को विस्मृत कर दिया गया है, आप एक पुण्य कार्य कर रहे हैं उन सभी के बारे में जानकारी देकर और प्रेरणा दे रहे हैं इन सभी तीर्थ स्थानों की यात्रा करने हेतु. साधुवाद!

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